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सामाजिक विचलन क्या है - अर्थ, परिभाषा, प्रकार, कारण, विशेषता | Social Deviance in Hindi | samajik vichalan

सामाजिक विचलन

प्रस्तुत लेख में सामाजिक विचलन के बारे में बताया गया है जिसमें बताया गया है कि समाज में ऐसे व्यक्ति और समूह विद्यमान होते हैं जो सामाजिक आदर्शों का अनुपालन ही नहीं करते तथा जो सामाजिक मानदण्डों के खिलाफ कार्य करते हैं। उन्हें ही सामाजिक विचलन की श्रेणी में रखते हैं। फैशन या नई शैली के नाम पर अनेक ऐसे व्यवहार भी होते हैं जो समाज के प्रचलित आदर्शों के अनुरूप नहीं होते है लेकिन फिर भी समाज उन्हें अपराध की संज्ञान नहीं देता बल्कि अपनी अप्रत्यक्ष सहमति से बने रहने देता है।
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इस प्रकार सामाजिक विचलन तब पैदा होता है जब वह स्वीकृत आदर्शों से हटा हुआ होता है और एक ऐसा कार्य हो जिसके बारे में समुदाय उग्र महसूस करता है। इतना उग्र की ऐसी प्रतिक्रियायें करता है कि उस विचलित व्यवहार को होने ही न दिया जाये या फिर नियंत्रित कर दिया जाये। अतः हम कह सकते हैं कि वे व्यवहार जो समाज द्वारा सहमति से अनुपालित न होते हों सामाजिक विचलन की श्रेणी में आते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सामाजिक विचलन के विभिन्न आयामों की चर्चा प्रस्तुत लेख में की गई है।

सामाजिक विचलन की अवधारणा

प्रत्येक समाज में ऐसे व्यक्ति और समूह विद्यमान होते हैं जो सामाजिक आदर्शों का अनुपालन ही नहीं करते। भारत में सरकार द्वारा प्रतिवर्ष चोरी, डकैती, आत्महत्या, नशाखोरी, जुआ, बलात्कार आदि के सम्बन्ध में आँकड़े प्रकाशित किए जाते हैं। ऐसा सभी समाजों में होता है। फैशन या नई जीवन शैली के नाम पर अनेक ऐसे व्यवहार भी होते हैं जो समाज के प्रचलित आदर्शों के अनुरूप नहीं होते। समाज भी उन्हें अपराध की संज्ञा नहीं देता वरन् अपनी अप्रत्यक्ष सहमति से बने रहने देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विचलन के प्रति समाज की प्रतिक्रियाएँ भिन्न-भिन्न हो सकती है। स्वाभाविक प्रश्न उठते हैं कि विचलन कौन सा व्यवहार है?
वह क्यों होता है ? उसके समाज के लिए क्या परिणाम होते हैं ? अब हम इन्हीं मुख्य प्रश्नों पर विचार करेंगे।

सामाजिक विचलन का अर्थ एवं परिभाषा

विचलन उतना ही पुराना है जितना कि मानव समाज । प्रत्येक युग में विचलन होता रहा है और समाज उसके रोकथाम की व्यवस्था करता रहा है। इस व्यवस्था के होते हुए भी यदि किसी ने विचलन किया तो समाज ने उसे दण्डित किया। उदाहरणार्थ, रामायण के नायक राम के युग में एक ऐसी घटना आती है कि शम्बूक नामक शूद्र वेद-मंत्रों के उच्चारण सहित घोर तपस्या कर रहा था। उसका यह व्यवहार वर्ण धर्म के अनुकूल नहीं था क्योंकि शूद्रों को इस प्रकार से तपस्या करने का अधिकार नहीं था। शम्बूक अपराधी घोषित किया गया, वह विचलन का दोषी था। महाराजा राम ने उसे प्राण दण्ड दिया। इससे यह भी सिद्ध होता है कि विभिन्न कालों में विचलन कहे जाने वाले व्यवहारों की स्थिति बदल भी सकती है। जैसे आधुनिक युग में कोई निम्न जाति का व्यक्ति इस प्रकार तपस्या करता है तो वह कदापि विचलनकर्ता नहीं कहा जाएगा। इस भाँति, किसी भी व्यक्ति या समूह का कोई भी व्यवहार, जिसे करने की समाज उनसे आशा नहीं करता, सामाजिक विचलन कहा जाता है।

प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्नांकित शब्दों में परिभाषित किया है-
  1. इंकलिस के अनुसार, “सामाजिक विचलन तब पैदा होता है जब वह स्वीकृत आदर्शों से हटा हुआ हो और एक ऐसा कार्य हो जिसके बारे में समुदाय उग्र महसूस करता है, इतना उग्र कि ऐसी प्रतिक्रियाएँ करता है कि उस विचलित व्यवहार को होने ही न दिया जाए या फिर नियन्त्रित कर दिया जाए।" इस भाँति, इंकलिस के अनुसार सामाजिक विचलन वही व्यवहार कहा जाएगा जो समाज की कड़ी प्रतिक्रिया का विषय बन जाए और समाज इसे रोकने या नियन्त्रित करने के लिए तत्पर हो उठे। दूसरे शब्दों में, यह व्यवहार समाज के प्रमुख मूल्यों की दृष्टि से हटकर ही नहीं है वरन् अपकारी भी है।
  2. फैडरिको के अनुसार, "समाजशास्त्री इस शब्द का प्रयोग किसी भी उस व्यवहार के लिए करते हैं जो समाज की प्रत्याशाओं का उल्लंघन करता है।" इस परिभाषा में वे सभी व्यवहार सम्मिलित है जो समाज के अन्य सदस्यों द्वारा असाधारण, अप्राकृतिक, अप्रचलित व अनैतिक हैं या सीधे और साफ नहीं समझे जाते। फैडरिको जैसे विद्वानों ने सामाजिक विचलन को व्यापक अर्थों में परिभाषित किया है। उनके अनुसार प्रत्येक विचलन समाज की कड़ी प्रतिक्रिया भी आमन्त्रित करता है।
  3. लाईट तथा कैलर के अनुसार, "विचलन एक आवरणपूर्ण शब्द है जो प्रतिभा तथा साधुता से लेकर अपराध एवं पागलपन, विद्रोह तथा सनकीपन सभी कुछ को आच्छादित कर लेता है। वास्तव में, कोई भी व्यवहार जो सामाजिक प्रत्याशाओं का उल्लंघन करता है, विचलित व्यवहार के रूप में चिन्हित किया जा सकता है।"
अतः स्पष्ट है कि विचलन की परिभाषा समाज विशेष के सन्दर्भ में ही की जा सकती है। विचलन वह व्यवहार है जो उस समय के अधिसंख्यक सदस्यों द्वारा अस्वीकृत है व जिसके विरूद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए।

सामाजिक विचलन की विशेषतायें

विचलन की उपर्युक्त परिभाषाओं के विवेचन के आधार पर इसकी निम्नांकित विशेषताएं स्पष्ट होती हैं -
  1. अर्थ की व्यापकता - यह एक व्यापक अर्थ वाला शब्द है जिसमें एक नहीं अनेक प्रकार के व्यवहारों को सम्मिलित किया जाता है। किसी भी समाज में विचलित व्यवहार की सूची बना देना कठिन ही नहीं प्रायः असम्भव भी है।
  2. सामाजिक आदर्शों द्वारा परिभाषित - कोई भी व्यवहार अपने में विचलन नहीं होता अपितु वह तो सामाजिक आदर्शों की कसौटी पर ही विचलन अथवा अनुपालन कहा जाएगा। उदाहरणार्थ, सिपाही भी दंगाइयों पर गोली चलाता है और उससे मानव-वध भी होता है, परन्तु उसे हत्या करने का अपराधी नहीं माना जा सकता है जबकि अन्य व्यक्तियों द्वारा किया जाने वाला ऐसा व्यवहार निश्चित ही विचलन व हत्या कहा जाएगा।
  3. परिभाषा की परिवर्तनशीलता - विचलन की परिभाषा समयानुसार बदलती रहती है। उदाहरणार्थ, कभी सती होने वाली स्त्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित थी तो आज कोई भी स्त्री यदि अपने मृत पति के शव के साथ जलने का प्रयास करेगी तो आत्महत्या की दोषी मानी जायेगी और दण्डनीय होगी।
  4. सांस्कृतिक विभिन्नताएँ - विचलन की परिभाषा एक ही समाज में दो भिन्न कालों में या उसके दो विभिन्न वर्गों में ही भिन्न-भिन्न नहीं होती वरन् विभिन्न संस्कृतियों में भी एक ही कार्य के प्रति विभिन्न दृष्टिकोण हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, कुछ अरब देशों में पुरूष समलैंगिक व्यवहार विचलन नहीं माना जाता, जबकि हमारे देश में यह अप्राकृतिक मैथुन माना जाता है जोकि दण्डनीय अपराध है। कनाडा में तो समलैंगिक विवाह को भी सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है।
  5. स्पष्टीकरण भी परिवर्तनशील - विचलन की परिभाषा ही नहीं बदलती, बल्कि विचलित व्यवहार के स्पष्टीकरण भी बदलते रहते हैं। उदाहरणार्थ, लाइट तथा कैलर ने अमेरिकी समाज में समलैंगिकता के स्पष्टीकरण की परिवर्तनशीलता के सम्बन्ध में लिखा है कि कभी इसे प्रकृति के विरुद्ध अपराध, पाप या भ्रष्टता माना जाता था जिसका आशय था कि दोषी व्यक्ति नैतिक रूप से सज्जन व्यक्तियों के बीच जीने के लिए अनुपयुक्त है। बाद में इसे मानसिक रोग माना जाने लगा जो ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण बाध्यता पैदा कर देता है कि व्यक्ति ऐसा कार्य कर बैठता है परन्तु मनोचिकित्सा से इसका उपचार किया जा सकता है। परन्तु सन् 1974 में अमेरिकी मनोचिकित्सा संघ ने यह घोषित किया कि यह कोई मानसिक रोग नहीं है, बल्कि मनुष्य की लैंगिक अभिरूचि में गड़बड़ी है।
  6. सम्बन्धित व्यक्ति की प्रस्थिति से प्रभावित - विचलन के निर्धारण में ऐसे व्यवहार करने वाले व्यक्तियों की सामाजिक प्रस्थिति भी प्रभाव डालती है। उदाहरणार्थ, अमीरों के लिए भोजन से पहले मदिरा का सेवन करना एक सामाजिक परम्परा का विषय है, अमीरों का शोक है, परन्तु गरीबों के लिए यही काम व्यवहार का दोष है और उसे शराबी कहा जाता है। सच तो यह है कि विचलन का निर्धारण आंशिक रूप से सामाजिक शक्ति का विषय भी है। जो लोग शक्ति की स्थिति में होते हैं और अपने निर्णयों को लागू कर सकते हैं, वे ही इस बात को तय करते हैं कि किस आचरण को उचित कहा जाए और किस आचरण को विचलन।

सामाजिक विचलन के कारण

व्यक्ति विचलन क्यों करता है ? विचलन के कारणों को लेकर विभिन्न मद प्रस्तुत किये गये है।

विचलन के कारणों को तीन प्रमुख श्रेणियों में बाँटा गया है जो अग्रलिखित है -

1. जैविकीय कारण- जैविकीय कारणों में हम उन सभी कारणों को सम्मिलित कर सकते हैं जो व्यक्ति ने जन्मजात शारीरिक लक्षणों या दोषों को विचलन के लिए उत्तरदायी होते हैं। वास्तव में जैविकीय कारकों में अपराधियों में स्पष्ट शारीरिक लक्षण होते हैं। उनके विकास में ही त्रुटि होती है। जैसे ज्यादातर अपराधियों की गालों की हड्डियां उभरी हुई होती है, जब चौड़े होते हैं, खोपड़ी चौड़ी होती है, नतुथने फुले हुये होते है, ये लोग पीढ़ा से अप्रभावित होते हैं। इनमें इच्छा प्रबल होती है कि अपने शिकार न केवल अंग-भंग किया जाये बल्कि उनके प्राण भी हरण कर लिये जाये।

2. मनोवैज्ञानिक कारण- मनो विश्लेषण बादियों ने फ्रायड का अनुकरण करते हुये विचलन का मनोवैज्ञानिक कारण प्रस्तुत किया है। उनके मतानुसार विचलित व्यवहार दमित इच्छाओं और कुण्ठाओं का परिणाम है। वह व्यक्ति जो अपने शैशव काल में अपने को उपेक्षित महसूस करता है या माता-पिता द्वारा दुर्व्यवहार का शिकार महसूस करता है, बड़े होकर अन्य व्यक्तियों के साथ भी सन्तुलित व्यवहार नहीं कर पाता। ऐसे व्यक्ति अन्यों की दृष्टि में किसी काम के परिणामों को नहीं देखते। वे विचलित व्यवहार करते हैं क्योंकि वे तो अपने शिकार की दृष्टि से सोचते ही नहीं। अल्बर्ट बान्दुरा ने भी अपने अध्ययनों में पाया कि वे बालक जो निरन्तर कड़े अनुशासन में पलते हैं या जो माता-पिता के अतिरिक्त प्यार के वशीभूत होते हैं। वे भी अपने में केन्द्रित हो जाते हैं और विचलित व्यवहार करते हैं।

3. समाजशास्त्रीय कारण- वास्तव में विचलन का अध्ययन दुर्थीम द्वारा ही प्रारम्भ कर दिया गया था जब उन्होनें अपनी पुस्तक सामाजिक अप्रतिमानता की व्याख्या प्रस्तुत की। मर्टन ने उनकी विचार धारा को और आगे बढ़ाया। मर्टन के अनुसार सामाजिक संरचना अपने सदस्यों के सम्मुख व्यवहार के लिये सांस्कृतिक लक्ष्य ही प्रस्तुत नहीं करती। वरन् उनकी प्राप्ती के लिए संस्थागत साधनों को भी निर्धारित कर देती है। यदि कोई व्यक्ति संस्कृति द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में संस्थागत उपायों को ही अपनाता है तो वह अनुपालन कर रहा होता है। अन्य परिस्थितियों में अप्रतिमानता की स्थिति होती है जोकि विचलित व्यवहार की ओर ले जाती है।

विचलित व्यवहार का समाजशास्त्र

विचलित व्यवहार असामान्य व्यवहार को कहते हैं। अन्य शब्दों में, यह एक ऐसा व्यवहार है जो समाज के सदस्यों के सामान्य व्यवहार से अलग है। विचलित व्यवहार का अर्थ समाज के भिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है तथा इसीलिए इसकी परिभाषा उस समह द्वारा दी जाती है जो सामाजिक, राजनीतिक अथवा आर्थिक दृष्टि से प्रबल होता है। सामान्यतः सामाजिक रूप से विचलित व्यक्ति उसे कहते हैं जो समूह, संगठन, संस्था अथवा समाज के व्यवहार के सामाजिक नियम या कानून को तोड़ता है। अतः यह एक ऐसा व्यवहार है जो पहले तो खतरनाक नहीं होता अपितु बाद में अपराधों को प्रोत्साहन दे सकता है। समाजशास्त्र की जिस शाखा में विचलित व्यवहार का अध्ययन किया जाता है उसे 'विचलित व्यवहार का समाजशास्त्र' कहा जाता है।

सेलिन ने अपराध की व्याख्या अपराधी व्यवहार को आधार मान कर दी है। इनके अनुसार सांस्कृतिक जीवन में होने वाला संघर्ष विचलित व्यवहार को प्रोत्साहन देता है। वास्तव में, विचलित व्यवहार संस्कृति द्वारा ही परिभाषित होता है तथा इसके द्वारा ही निर्धारित होता है। अतः यह किसी सांस्कृतिक मान्यताओं या सामान्य व्यवहार प्रतिमानों के विपरीत किया गया कार्य है। अतः समूह इन प्रतिमानों को तोड़ने वालों का प्रतिरोध करते हैं। यह प्रतिरोध कम या अधिक मात्रा में हो सकता है तथा उस व्यवहार नियम पर आधारित है जिसे तोडा गया है।

प्रो० सुशील चन्द्र ने भारत में विचलन के समाजशास्त्र में तीन प्रमुख पहलुओं को सम्मिलित किया है। ये हैं -
  1. बाल निराश्रयता
  2. भिक्षावृत्ति; तथा
  3. जातीय दूरी तथा पृथक्करण।

के. एस. शुक्ला ने भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद के लिए लिखे प्रवृति लेख में विचलित व्यवहार के समाजशास्त्र में निम्नांकित पहलुओं को सम्मिलित किया है -
  1. पुरूषों में विचलन
  2. स्त्रियों में विचलन
  3. बालकों में विचलन
  4. आत्महत्या
  5. गैर-अधिसूचित समुदाय तथा विचलन
  6. मादक द्रव्य व्यसन तथा मद्यपान; तथा
  7. सुधार।

पुरूषों में विचलन अनेक रूपों में पाया जाता है। उदाहरणार्थ, संघर्ष तथा तनाव से लेकर मानसिक दुर्बलता एवं अपराध तक इसमें सम्मिलित है। स्त्रियों में विचलन से सम्बन्धित सर्वाधिक अध्ययन देवदासी प्रथा, काल गर्ल, वेश्यावृत्ति तथा अपराधी महिलाओं के बारे में हुए हैं। किशोरों अथवा बालकों में विचलन सम्बन्धी अध्ययन मुख्य रूप से बाल अपराधियों, बाल भगोड़ों, इत्यादि पर ही किए गए है। आत्महत्या पर भारत में अनेक अध्ययन हुए है। गैर-अधिसूचित समुदायों में मुख्यतः भूतपूर्व अपराधी जनजातियों में सामाजिक विचलन को सम्मिलित किया जाता है। मादक द्रव्य व्यसन तथा मद्यपान के बारे में अनेक सामाजिक वैज्ञानिकों ने उल्लेखनीय कार्य किए है। सुधार से सम्बन्धित अध्ययनों में के. एस. शुक्ला ने किसी संस्था के भीतर रहने वालों में सुधार सम्बन्धी तथा सुधार प्रशासन सम्बन्धी अध्ययनों को सम्मिलित किया है।

सार संक्षेप

प्रस्तुत लेख में सामाजिक विचलन की अवधारणा के बारे में प्रकाश डाला गया है जिसमें बताया गया है कि सामाजिक विचलन वह है जो सामाजिक आदर्शों के अनुरूप न हो। इसी इकाई में सामाजिक विचलन का अर्थ एवं परिभाषाओं को प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत लेख में सामाजिक विचलन की प्रमुख विशेषताओं का वृहद वर्णन प्रस्तुत किया गया है। जिससे सामाजिक विचलन को समझने में आसानी होगी। प्रस्तुत इकाई में ही विचलन के कारणों जैसे जैविक कारण, मनोवैज्ञानिक कारण, तथा समाज शास्त्रीय कारणों पर विशेष प्रकाश डाला गया है। अन्त में विचलित व्यवहार के समाज शास्त्र के बारे में भी ब्यौरा प्रस्तुत किया गया है।

पारिभाषिक शब्दाबली
  1. सामाजिक विचलन - सामाजिक विचलन तब पैदा होता है जब वह स्वीकृत आदर्शों से हटा हुआ हो और एक ऐसा कार्य हो जिसके बारे में समुदाय उग्र महसूस करता हो, इतना अग्र कि ऐसी प्रतिक्रियायें करता है कि उस विचलित व्यवहार को होने ही न दिया जाय या फिर नियंत्रित कर दिया जाय।

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